गुरुवार, 17 जुलाई 2008

सपनो के जहाँ में




चलो
सपनो के जहाँ में
फ़िर चलते हैं
किसी अपने से
फ़िर मिलते हैं....



जहाँ न हों
नजरें ज़माने की
छुप छुपकर फ़िर तनहा
सपनों में मिलते हैं.....


रोके न रुके
ऐसा जहाँ
सपनों की नदियाँ
और कश्ती पर तनहा
हम-तुम
चलो सपनों में
फ़िर मिलते हैं.....

मंगलवार, 15 जुलाई 2008

क्यों कुरेदा


कल

सुबह

पदचाप तेरी

मुझ तलक

आने लगी ,

क्यों कुरेदा

उन पलों को

राख में जो
दब

गए

बेडियाँ.....तेरी खुशियों की


बेडियाँ
मेरे पग
तेरी
खुशियों की

तुझे भूलना

तो न चाहूँ ,
बस
इक दीप
रोशन रहे
तेरे नयन
मेरी प्रीत का

टुकडा भर धुप

टुकडा भर धुप
और तेरा साथ
सहेजा था
मुट्ठी में.

मुट्ठी में बंधी रेत सा
कण कण
न जाने कहाँ
बिखर गया
और रह गयी
खाली खाली
मुट्ठी मुट्ठी मेरी
बस तेरा
एहसास लिए

सोमवार, 14 जुलाई 2008

दर्द शब्दों में ढले......


दर्द शब्दों में ढले

तो गीत होता हैं

भावना के सुर सजे

संगीत होता हैं

रूप की चाहत तो

तन के साथ हैं

बावरे मन का न कोई

मीत होता हैं

वे भी तो मेरे दोस्त थे



वे भी तो मेरे दोस्त थे

जो देते रहे फरेब

मोहब्बत के नाम पर

पहले आप

पहले आप
आप से तुम
तुम से तू
और फिर कहने की नहीं
समझने की बात हैं