
चलो
सपनो के जहाँ में
फ़िर चलते हैं
किसी अपने से
फ़िर मिलते हैं....
जहाँ न हों
नजरें ज़माने की
छुप छुपकर फ़िर तनहा
सपनों में मिलते हैं.....
रोके न रुके
ऐसा जहाँ
सपनों की नदियाँ
और कश्ती पर तनहा
हम-तुम
चलो सपनों में
फ़िर मिलते हैं.....
भावनाओं को शब्द आकार देते हैं, जुबान कभी शब्दों को बयां नहीं कर पाती, उन पलों को सहेजना ही कविता हैं. अनकहें पलों और जज्बातों को उकेरना ही सुकून देता हैं. सच बोलने और सहने का साहस आज किसी में नहीं, बस इसीलिए जो महसूस करो, उसे उकेर दो कागज पर