शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

तनहा हूँ मैं

तनहा हूँ मैं
संगी मेरे
तुझ बिन ।
इक पल
अंधियारी जिंदगानी में
झांक गए तुम
मीत मेरे
काटना ही हैं
सफ़र
मुझे तो तनहा
सुकून देता
कोई
बस इक पल का.

1 टिप्पणी:

संजय भास्कर ने कहा…

हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com